मोदीराज में किसानों को जानकारी देने के नाम पर कृषि को पूंजीवाद के हवाले करने का षड्यंत्र

अब सरकार पूरी कृषि व्यवस्था (agricultural infrastructure) को डिजिटल स्वरुप (digital form) देने के नाम पर एग्रीस्टैक (Agristack) के नाम पर किसानों की व्यक्तिगत जानकारी जुटाने के प्रयास में है तो दूसरी तरफ बड़े पैमाने पर कृषि के क्षेत्र को निजी कंपनियों के हाथों में देने की फिराक में है। इस काम के लिए जिन पांच डिजिटल कंपनियों से करार किया गया है उसमें सिस्को (CISCO) नामक अमेरिकी कंपनी भी है, जबकि हमारे प्रधानमंत्री लगातार भारत को आत्मनिर्भर बनाने के प्रवचन देते रहे हैं।

इसमें अम्बानी की जिओ प्लेटफ़ोर्म लिमिटेड (Jio Platform Limited) भी शामिल है, जाहिर है जल्दी ही अम्बानी (Ambani) बड़े पैमाने पर कृषि क्षेत्र में नजर आयेंगें। मोदी जी के मित्र, गौतम अडानी तो पहले से ही सेव के बागान और ना जाने क्या-क्या चला रहे हैं। कृषि और किसानों के डिजिटल स्वरुप के लिए अन्य कम्पनियां जिनसे कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर (Union Agriculture Minister Narendra Singh Tomar) ने करार किया है, उनके नाम हैं – निन्जाकार्ट (Ninjacart), आईटीसी लिमिटेड (ITC Limited) और नेकडेस्क ई मार्केट्स लिमिटेड (NCDEX e Markets Limited)।

कृषि मंत्री ने इस करार को करते हुए, कहा कि इससे कृषि और किसानों से सम्बंधित व्यापक जानकारी एक जगह एकत्रित की जा सकेगी और इससे किसानों को लाभ होगा, उत्पादन बढेगा, निजी कंपनियों का बड़े पैमाने पर आगमन होगा, नई प्रोद्योगिकी आयेगी और किसानों का लाभ बढेगा। याद कीजये, तीन नए कृषि कानूनों (Farm Laws), जिनका विरोध किसान लगातार कर रहे हैं, के समय भी यही सारी बातें कही गईं थीं।

सबसे बड़ी और चिंताजनक बात यह है कि एग्रीस्टैक के तहत किसानों को एक विशेष किसान आइडेंटिफिकेशन नंबर (Farmer’s Identification Number) दिया जाएगा, जिसके लिए हरेक किसान की व्यक्तिगत जानकारी को जुटाया जाएगा। अनेक किसान नेता व्यक्तिगत जानकारी को किसी निजी या बहुराष्ट्रीय कंपनियों (Private or Multinational Firms) को देने का विरोध कर रहे हैं। और, यह सरकार हरेक काम चुपचाप करती है और एक दिन पता चलेगा कि देश के हरेक किसान की व्यक्तिगत जानकारी अम्बानी या अडानी के पास मौजूद है – सरकार यही चाहती है।

कृषि मंत्री कहते हैं कि एग्रीस्टैक के बाद उत्पादन बढेगा, पर सरकारी आंकड़ों के अनुसार खाद्यान्न उत्पादन साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है। किसान सारी मुसीबतों के बाद भी देश की मांग से अधिक खाद्यान्न उत्पादन कर रहे हैं, समस्या इसके उचित मूल्य, भंडारण और तुरंत भुगतान की है। इस सभी मसलों पर प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री किसानों के बीच केवल खोखले आश्वासन परोसते हैं – समस्याए और विकराल होती जा रही हैं।

अलीगढ (Aligarh) में प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें छोटे किसानों की बड़ी फ़िक्र है और इन किसानों के लिए उन्होंने अनेक कदम उठाये हैं। इस मामले में अपने आप को पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह (Chaudhary Charan Singh) के समकक्ष खड़ा कर लिया। मोदी जी ने कहा देश के 10 में से 8 किसान के पास 2 हेक्टेयर से छोटा खेत है और इन किसानों के लिए उन्होंने लगातार काम किया है। प्रधानमंत्री जब किसानों के बारे में बात करते हैं तब अजीब सा लगता है, क्योंकि उन्होंने और उनकी सरकार ने किसानों के बारे में संसद से लेकर सभाओं तक हरेक जगह कृषि कानूनों के बारे में झूठ ही बोला है और इसपर किसानों से बात करने के बदले इस कानूनी झूठ को फैलाने के लिए अपने मंत्री-संतरी तक को सडकों पर उतार दिया था।

किसानों की त्रासदी केवल सरकार और बीजेपी तक सीमित नहीं है, बल्कि जो समाज उन्हें अन्नदाता घोषित करता है, उसी समाज का मीडिया और सोशल मीडिया (mainstream media and social media) उन्हें बदनाम करने पर तुला है। किसान चाहते हैं कि फसलों के मिनिमम सपोर्ट प्राइस (Minimum Support Price) के अनिवार्यता के लिए लिए भी एक नया क़ानून बनाया जाए, पर मीडिया और सोशल मीडिया पर बार-बार बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री ने स्वयं कह दिया है कि एमएसपी नहीं हटेगा किसानों को और क्या गारंटी चाहिए?

मीडिया और सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के वचनों को ब्रह्मवाक्य और देश का क़ानून बता कर किसानों को बहकाने में प्रयासरत बीजेपी कार्यकर्ता, मीडिया से जुड़े लोगों और अंधभक्तों को सबसे पहले नोटबंदी के समय महान प्रधानमंत्री के वचनों और वादों की समीक्षा करनी चाहिए – दरअसल हकीकत तो यही है कि प्रधानमंत्री जो कहते हैं ठीक उसका उल्टा होता है।

नोटबंदी के समय भी प्रधानमंत्री सबसे पिछड़े तबके का विकास चाहते थे, पर अडानी-अम्बानी और अमीर हो गए और पिछड़े अति-पिछड़े में तब्दील हो गए। नए कृषि कानूनों के बारे में फिर से प्रधानमंत्री सबसे पिछले लोगों के भले की बात कर रहे है, जाहिर है नोटबंदी वाला परिणाम फिर सामने आएगा। प्रधानमंत्री जी बताते हैं कि सरकारी मंडियां वहीं रहेंगीं, पर मंडियों के बारे में बात करते हुए भूल जाते हैं कि नए कृषि कानूनों का सबसे मुखर विरोध उन राज्यों के किसान ही कर रहे हैं जहां जीवंत सरकारी मंडियां हैं।

समाज में भी किसानों की चर्चा उनकी आत्महत्याओं (Suicides by farmers) या फिर आन्दोलनों के समय ही उठती है। दरअसल उपभोक्ता और पूंजीवादी बाजार ने किसानों और समाज के बीच गहरी खाई पैदा कर दी है। एक दौर था जब अनाज दूकानों में बोरियों में रखा जाता था और इसे खरीदने वाले अनाज के साथ ही किसानों के बारे में भी सोचते थे। आज का दौर अनाज का नहीं है, बल्कि पैकेटबंद सामानों (packaged products) का है। इन पैकेटबंद सामानों को हम वैसे ही खरीदते हैं, जिस तरह किसी औद्योगिक उत्पाद को खरीदते हैं और इनके उपभोग के समय ध्यान उद्योगों का रहता है, न कि खेतों का।

हरित क्रान्ति के बाद से भले ही कुपोषण (malnutrition) की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही हो, पर्यावरण का संकट गहरा होता जा रहा हो, भूजल लगातार और गहराई में जा रहा हो, पर अनाज से सम्बंधित उत्पादों की कमी ख़त्म हो गई है। पहले जो अकाल का डर था वह मस्तिष्क से ओझल हो चुका है और इसके साथ ही किसान भी समाज के हाशिये पर पहुँच गए। सरकारें भी पिछले कुछ वर्षों से किसानों की समस्याओं के प्रति उदासीन हो चुकी हैं। आज के दौर में हालत यह है कि खेती को भी पूंजीवाद के चश्में से देखा जा रहा है, और एक उद्योग की तरह चलाने की कोशिश की जा रही है। खेती से जुडी सबसे बड़ी हकीकत यह है कि बहुत बड़े पैमाने पर किये जाने श्रम में कुछ भी निश्चित नहीं है।

इसमें किसान का श्रम और पूंजी ही बस निश्चित होती है, आजकल बिजली और पानी भी अधिकतर जगहों पर उपलब्ध है – इतने के बाद भी एक बुरे मौसम की मार सबकुछ ख़त्म कर देती है। खेती एक ऐसा काम है जहां सारे श्रम, पूंजी और रखवाली के बाद भी उपज या पूंजीवादी शब्दावली में उत्पाद की कोई गारंटी नहीं है। फिर भी करोड़ों किसानों का जीवट ही है जो उन्हें खेती करने के लिए प्रोत्साहित करता है। यदि सबकुछ ठीक रहा और अनुमान के मुताबिक़ उपज भी रही तब भी लागत मूल्य भी बाजार से वापस होगा भी या नहीं, इसका पता नहीं होता।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here